Shesh Bharat: अब नहीं तो कभी नहीं! 2026 में बंगाल फतह के लिए BJP का नया प्लान

Shesh Bharat: दिलीप घोष की बीजेपी में वापसी लगभग तय मानी जा रही है. अमित शाह से मुलाकात के बाद संकेत साफ हैं कि पार्टी 2026 के बंगाल चुनाव से पहले पुराने और आजमाए हुए चेहरे पर दांव लगा सकती है.

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Shesh Bharat: एक्टिव राजनीति में रहते हुए नेता संन्यास तब लेते हैं, जब या तो बहुत ज्यादा राजनीति कर ली हो या पार्टी में पूछ घट गई हो या हाईकमान पर प्रेशर बनाना हो. कोई वनवास में पड़ा रहता है, कोई संन्यास लेता है. पश्चिम बंगाल में दिलीप घोष ने संन्यास का इरादा तब बनाया, जब पार्टी में उनसे ज्यादा सुवेंदु अधिकारी की पूछ होने लगी. सुवेंदु की पूछ ममता बनर्जी के बेहद करीबी होते हुए बीजेपी में आने से बढ़ी.  बीजेपी को किसी भी कीमत पर बंगाल चाहिए, जो ममता बनर्जी ने होने नहीं दिया. दिलीप घोष पार्टी में साइडलाइन हुए तो उन्होंने एक्टिव राजनीति छोड़कर नई राह पकड़ ली. 60 साल की उम्र में शादी की. क्या ही पता था कि बंगाल में उन्होंने जो कर दिखाया वही उन्हें फिर से मेनस्ट्रीम में लेकर आएगी. 

अभी पक्का नहीं कि बीजेपी में दिलीप घोष की वापसी किस रोल में होगी. लेकिन वापसी तो कन्फर्म हो गई है. बंगाल के विधानसभा चुनाव से पहले अमित शाह तीन दिन के लिए कोलकाता में थे. उसी दौरान दिलीप घोष से मुलाकात हुई. यहीं से खत्म हुआ दिलीप घोष का वनवास. कोलकाता के होटल में दिलीप घोष ने अमित शाह के साथ प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य, विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार के साथ बंद कमरे की बैठक की. 

बंगाल में कभी माना नहीं गया कि दिलीप घोष संन्यास लेकर राजनीति से दूर हो जाएंगे. 60 साल की उम्र में घोष बाबू ने दो-दो धमाके किए. एक तो 47 साल की रिंकू मजूमदार से शादी की. शादी के बाद हनीमून जाते लेकिन चले गए ममता बनर्जी के पास. दीघा ने ममता बनर्जी ने पुरी जैसे जगन्नाथ मंदिर बनवाया. मंदिर के उद्घाटन के सरकारी कार्यक्रम में ममता ने दिलीप घोष को पत्नी रिंकू के साथ बुला लिया. किसी पद पर नहीं होने के बाद भी ममता ने मिसेज एंड मिस्टर घोष के स्वागत के लिए सरकार के मंत्री अरूप बिश्वास और पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष को भेजा था. बीजेपी को चिढ़ाने के लिए मुलाकात की फेसबुक पर लाइव स्ट्रीमिंग कराई. दिलीप घोष ने पार्टी में रहकर पार्टी का मोये-मोये करा दिया.

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हालांकि इसके आगे दिलीप घोष और ममता बनर्जी की केमेस्ट्री आगे नहीं बढ़ी लेकिन बीजेपी को दिलीप घोष की जरूरत समझ आने लगी. दिसंबर में सांसद अभिजीत गांगुली ने दिलीप घोष की चर्चा छेड़ी. कहा कि वो बंगाल में बीजेपी के सबसे सफल अध्यक्ष रहे हैं. ये कहने में परहेज नहीं कि पार्टी में एक बड़ा वर्ग मानता है कि दिलीप घोष को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद पार्टी बंगाल में कमजोर पड़ी है. अगर दिलीप घोष सामने आकर फिर से पार्टी को नेतृत्व दें, तो ये पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकता है. अभिजीत गांगुली के बयान का फौरन असर हुआ. नए साल में शाह की घोष बाबू को मीटिंग हो गई.

बंगाल में दिलीप घोष ऐसे नेता हैं जिन्होंने 40 साल की राजनीति में कभी किसी और पार्टी का मुंह नहीं देखा. 1984 में आरएसएस ज्वाइन की. 2014 में आरएसएस के सरसंघचालक के एस सुदर्शन के पर्सनल असिस्टेंट बन गए. वहीं से बीजेपी का खुला. तब बंगाल बीजेपी के फोकस एरिया में था लेकिन ऐसा कोई नेता नहीं था जो पार्टी को आगे ले जा सके. संघ से निकले दिलीप घोष पसंद बने. 2015 में उन्होंने प्रदेश बीजेपी का चार्ज संभाला और पार्टी को इस स्थिति में पहुंचा दिया कि ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी बन गई. पहला करिश्मा हुआ 2016 के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी ने बंगाल में सीटें तो ज्यादा नहीं जीती लेकिन वोट शेयर 10 परसेंट के पार चला गया. 

बरसों की मेहनत का सबसे बड़ा रिजल्ट 2019 में निकला. एक झटके में बीजेपी ने 42 में से 18 लोकसभा सीटें जीतकर सनसनी मचा दी. पहली बार लगा कि ममता की गद्दी हिलाने के लिए बीजेपी तैयार हो गई है. तब भी दिलीप घोष ही बीजेपी के सबसे बड़े नेता और प्रदेश अध्यक्ष थे. फिर आया 2021 का चुनाव जिसमें मान लिया गया था कि बीजेपी की सरकार आई और ममता की सरकार गई लेकिन ममता ने बाउंस बैक कर दिखाया. फिर भी बीजेपी ने विधानसभा में 38 परसेंट वोट शेयर के साथ पहली बार 77 सीटें जीत ली. पार्टी को 77 की जीत पची क्योंकि उम्मीद सरकार बनाने की थी. चुनाव बाद बीजेपी में भगदड़ मची. सुवेंदु, सुकांत नए-नए चेहरे पार्टी में एक्टिव हुए और दिलीप घोष किनारे लगते गए. वहीं से दिलीप घोष का डाउन फॉल शुरू हुआ. 

दिलीप घोष पीछे होने लगे. सुकांत मजूमदार नए प्रदेश अध्यक्ष और सुवेंदु अधिकारी बीजेपी के फेस के तौर पर प्रमोट होने लगे. दिलीप घोष को दिल्ली में पार्टी उपाध्यक्ष बनाकर एडजस्ट किया गया या साइडलाइन कर दिया गया. 2024 के चुनावों में बीजेपी को जोर का झटका लगा. क्रांतिकारी चुनावी तैयारी, स्ट्रैटजी के बाद भी बीजेपी को झटका लगा. 18 लोकसभा सीटें घटकर 12 रह गईं. ममता का बोलबाला और ज्यादा हो गया. बीजेपी ममता बनर्जी से हारी उन्होंने तंज कसा कि ओल्ड इज गोल्ड. बीजेपी का बंगाल में बढ़ना खत्म हो गया है. तब दिलीप घोष पार्टी के आदेश पर मेदिनीपुर से लड़े थे और कीर्ति आजाद से हारे थे. 

शायद 2024 के उसी रिजल्ट ने दिलीप घोष की वापसी का रास्ता खोला है. अमित शाह से मिलने का मतलब बीजेपी को बंगाल में फिर ऐसा कोई चेहरा चाहिए जो कायापलट कर दे. सुवेंदु की स्थिति मजबूत बनी है लेकिन दिलीप घोष और सुवेंदु दोनों मजबूत नहीं रह सकते. एक तो ज्यादा मजबूत दिखना और होना होगा. सुवेंदु के बायोडेटा में 2024 की हार है. दिलीप घोष के बायोडेटा में 2019 और 2021 की जोरदार लीड है. माना जाता है दिलीप घोष की दो क्वालिटी अग्रेसिव कैंपेन स्टाइल और ग्रास रूट कनेक्शन भी सुवेंदु से अलग बनाती है. बीजेपी की टेंशन ये है कि इस बार भी  बंगाल हाथ नहीं आया तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी. अभी नहीं तो कभी नहीं, ऐसा पार्टी मानती नहीं लेकिन 2026 के चुनावों में बंगाल नहीं तो कुछ नहीं.

 

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