Charchit Chehra: राहुल गांधी के करिश्मे ने बदली कांग्रेस की राजनीति, लेकिन फिर भी क्यों हैं सत्ता की कुर्सी से दूर?
Charchit Chehra Rahul Gandhi: राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा से लेकर संसद तक कांग्रेस की राजनीति को नई दिशा दी. 2024 में पार्टी को 99 सीटों तक पहुंचाया और विपक्ष के नेता बने, लेकिन 2025 में चुनावी नतीजे उनके पक्ष में क्यों नहीं आए? चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में जानिए वोट चोरी के आरोप, जाति जनगणना और मनरेगा जैसे मुद्दों पर आक्रामक राहुल गांधी आखिर सत्ता की कुर्सी से अब भी दूर क्यों हैं.

Charchit Chehra Rahul Gandhi: राहुल गांधी ने जब उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक दो-दो यात्राएं निकाली तब लोगों ने कहा कि कुछ नहीं होगा, लेकिन असर बहुत दूर तक हुआ. राहुल गांधी ने संविधान-संविधान और डरो मत कहकर 2024 का लोकसभा चुनाव पलट दिया. 10 साल के बाद संसद में वो पद पार्टी को दिलाया, जिसका इंतजार था. चुनाव के बाद संसद में जो जहां था वहीं रहा, मोदी तीसरी बार पीएम बनकर सत्ता पक्ष में बैठे और राहुल गांधी विपक्ष की बेंच पर. बदलाव ये हुआ कि कांग्रेस 52 से सीधे 99 सीटों तक पहुंच गई. 99 सीटें मिलने से राजनीति पलटी तो 10 साल बाद विपक्ष के नेता का संवैधानिक पद कांग्रेस को मिला और राहुल गांधी बने विपक्ष के नेता.
2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के बाउंस बैक करने और पार्टी को रिवाईव करने की अलग ही कहानी है. साल बीत गया, नया साल 2025 आया...हालांकि ये साल राहुल के लिए 2024 जैसा नहीं रहा लेकिन उन्होंने जो इस साल में किया, उससे सरकार से लेकर चुनाव आयोग तक हिला डाला. ऐसा जोर का झटका दिया कि सरकार हिलाने पूरा विपक्ष एकजुट हो गया. सड़क से संसद तक राहुल की आवाज पूरे साल गूंजी, जहां निशाने पर बीजेपी सरकार और उनके फैसले रहे.
चर्चित चेहरा के इस खास एपिसोड में आज जानेंगे क्या है राहुल की साल 2025 की उपलब्धि, कैसे एक बही खाते के साथ की गई उनकी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने सत्ता की जड़ों को हिलाया और कैसे वंचित वर्गों के लिए उठाई आवाज और मनरेगा में बदलाव की नीतियों पर कैसे की आवाज बुलंद...
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राहुल गांधी की उपलब्धि
साल 2025 भारतीय राजनीति के लिए उतार-चढ़ाव से भरा रहा और इस पूरी पिक्चर में राहुल गांधी एक ऐसे नेता के रूप में उभरे जो लगातार सत्ता से सवाल पूछते रहे, सड़क से संसद तक आवाज उठाते रहे. आज इतनी बुलंद आवाज में कांग्रेस को लोग जो आवाज उठाते हैं इसका क्रेडिट राहुल गांधी को ही जाता है. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले माना जा रहा था कि विपक्ष का सफाया हो गया है, फिर वो हुआ जिसकी उम्मीद शायद राजनीतिक पंडितों को भी नहीं थी.
राहुल गांधी की यह उपलब्धि कुछ वैसी ही मानी गई जैसी 1996-2004 के बीच गहरे संकटों से जूझती हुई कांग्रेस को सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व ने उबारा था. जहां 2019 में कांग्रेस महज 52 सीटों पर ही सिमट गई थी वहीं 2024 में 99 सीटों पर जीत हासिल की. राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपनी सीटें लगभग डबल कीं.
राहुल और वोट चोरी का मुद्दा
2024 राहुल और कांग्रेस के बाउंस बैक की कहानी है. माना जा रहा था कि 2025 भी कुछ ऐसा ही साबित होगा लेकिन यहां 2024 जैसे नतीजे देखने को नहीं मिला. किसी नए राज्य में सरकार कांग्रेस नहीं बना पाई. लेकिन इस साल राहुल ने अपनी रिसर्च टीम के साथ मिलकर वो कर दिया, जिससे केंद्र की सत्ता में बैठ बीजेपी की जड़े हिल गई. वोट चोरी के मुद्दे पर 7 अगस्त को हुई राहुल की प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐसा ही एक मौका था. राहुल गांधी डंके की चोट पर देश की राजधानी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाते हैं कि चुनाव आयोग वोटों की चोरी कर रहा है.
वैसे तो राहुल गांधी चुनाव आयोग और ईवीएम पर शुरू से ही साधते रहे लेकिन ज्ञानेश कुमार और एनडीए सरकार रडार पर तब से ज्यादा आ गए जब बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR और विपक्ष की ओर से लगाए गए वोट चोरी के आरोपों की वजह से देशभर में सियासी घमासान छिड़ गया.राहुल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग पर निशाना साधा, वोट चोरी के आरोप लगाए और एक-एक कर इसके उदाहरण दिए. राहुल टीवी स्क्रीन लगाकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसएस संधू की फोटो दिखाकर अपनी बात कहते रहे और एक के बाद एक धमाका करते रहे.
2025 में नहीं चला राहुल का मैजिक
2025 का बिहार विधानसभा चुनाव राहुल गांधी के लिए एक बड़ा राजनीतिक इम्तिहान था. राहुल ने वोटर अधिकार यात्रा निकाली, जनसभाएं कीं, युवाओं और किसानों के अलावा वंचित वर्गों के लोगों से भी सीधे तौर पर जुड़ने की कोशिश की. सबसे ज़्यादा सुर्खियां उस बयान ने बटोरीं, जिसमें उन्होंने 50% आरक्षण की सीमा हटाने की बात कही. हालांकि नतीजे कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के पक्ष में नहीं रहे. कांग्रेस की जीत कुछ सीटों तक सिमट गई. इसके बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठे. टीवी डिबेट्स में लगातार चुनावी हार और 95 से अधिक हार जैसे आंकड़े गिनाए जाने लगे.
साल की शुरूआत में दिल्ली विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के लिए निराशाजनक ही साबित हुए. पार्टी एक बार फिर सत्ता से दूर रही और यह हार राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए एक और बड़ी चुनौती के रूप में देखी गई. दिल्ली की हार ने यह साफ कर दिया कि राहुल की राजनीति सवाल खड़े करने में मजबूत जरूर है, लेकिन चुनावी नतीजों में इस राजनीति को जीत मिलने में शायद अभी वक्त है. हालांकि विपक्ष, कांग्रेस और राहुल गांधी शुरू से यह कहता रहा है कि बीजेपी की लगातार हर राज्य में होती जीत चुनाव आयोग और बीजेपी की मिलीभगत का नतीजा है, जहां वोट चोरी एक बड़ा मुद्दा रहा. देखा जाए तो 2024-25 की राहुल गांधी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि विपक्ष में रहते हुए भी वे सरकार पर दबाव बनाने में सफल रहे.
मुद्दे जिन्हें राहुल गांधी ने जोर-शोर से उठाया
बीते समय में राहुल गांधी ने जिन मुद्दों को जोर-शोर से उठाया, उन्हें वे अपनी राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि और आगे की राह मानते हैं. उन्होंने जाति जनगणना को अपना जीवन मिशन बताया और कहा कि इससे यह साफ पता चलेगा कि OBC, दलित और आदिवासी समाज की देश की तरक्की में कितनी हिस्सेदारी है. इसके अलावा राहुल ने मनरेगा योजना के बदलाव पर केंद्र सरकार को आलोचना की और इसे नोटबंदी जैसा नाशकारी फैसला बताया. उनका तर्क साफ था इसका सीधा असर ग्रामीण गरीबों और मजदूरों की रोजी-रोटी पर पड़ेगा. यह बयान सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांव-कस्बों में चर्चा का मुद्दा बन गया. इसके अलावा राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की भूमिका, पूर्व सैनिकों की समस्याएं, छोटे व्यापारियों पर GST का बोझ, वायु प्रदूषण और न्यायपालिका में सभी वर्गों की भागीदारी जैसे सवाल लगातार उठाए.
आने वाले समय में राहुल गांधी इन सभी मुद्दों को 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों से जोड़कर आगे बढ़ाना चाहते हैं और इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में होने वाले चुनावों को पार्टी सामाजिक न्याय, रोजगार, महंगाई, किसानों-मजदूरों के अधिकार, छोटे व्यापारियों की राहत और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती जैसे मुद्दों को जनता के बीच ले जाने का अवसर मान रही है, ताकि इन राज्यों में एक मजबूत और भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प पेश किया जा सके.
लगातार चर्चा में बने रहे राहुल
इस साल हुए विधानसभा चुनाव में जो नतीजे आए वो कांग्रेस के या इंडिया गठबंधन के पक्ष में नहीं रहे. दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी का जादू यहां नहीं देखने को मिला. लेकिन विधानसभा चुनावों में हार से ये नहीं कहा जा सकता है कि राहुल का जादू फीका पड़ गया है. वो अब भी जुटे हुए हैं लोगों के बीच जा रहे हैं और हमेशा कुछ अलग और नया कर रहे हैं. राहुल गांधी की राजनीति में इस दौर में बड़े बदलाव देखने को मिले. राहुल ने अचानक युवाओं, कारीगरों, गरीबों और किसानों के बीच पहुंचकर उनका कामकाज और हालात से रूबरू हुए. राहुल के इन कदमों को भी खूब सराहा गया और उनका सियासी ग्राफ अभी कम नहीं हुआ है, वो लगातार चर्चा में बने हुए हैं.
पीएम भी लेते हैं राहुल गांधी से सलाह
चुनाव बाद राहुल ने जो रुतबा संसद में पाया हैं, उसमें सरकार के कई फैसलों में मोदी को भी उनसे राय भी लेनी पड़ जाती है, ऐसा इसलिए क्योंकि अब राहुल विपक्ष के नेता हैं. अब मोदी राहुल की राय माने या ना माने, ये पूरी तरह उन पर निर्भर होगा. वैसे राहुल गांधी जब विपक्ष के नेता नहीं थे तब भी बड़े नेता थे. राहुल को राजनीति करते हुए आज 20 साल से ज्यादा का वक्त हो चला है.
2004 के लोकसभा चुनाव में राहुल ने पहली बार राजनीति में कदम रखा और इस राजनीति के गुर उन्हें विरासत में मिले हैं. जिस दमदार तरीके से कभी उनके परनाना, दादी और पिता अपनी बात सबके सामने रखा करते थे, ठीक वैसे ही राहुल भी अपनी हर बात बिना किसी हिचक के रख देते हैं. कुछ इस तरह दौड़ते भागते गांधी-नेहरू परिवार की चौथी पीढ़ी राहुल गांधी ने उनकी राजनीतिक विरासत संभाली जो आज सबके सामने है.
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