19 साल, 10 बेटियां और मौत के मुंह से वापसी: हरियाणा में बेटे की चाहत ने महिला को पहुंचाया 11वीं डिलीवरी तक, रूह कंपा देगा यह 'काला सच'
Haryana News: 10 बेटियों के बाद 11वीं बार मां बनी महिला की हालत देख डॉक्टर भी दंग रह गए. शरीर में सिर्फ 5 ग्राम खून और बेटे की चाहत की जिद. हरियाणा के जींद से आई इस हैरान करने वाली रिपोर्ट में पढ़ें पूरा सच.

हरियाणा के जींद जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जो आधुनिक समाज में 'बेटे की चाहत' की गहरी और डरावनी जड़ों को उजागर करती है. फतेहाबाद के ढाणी भोजराज गांव की एक महिला ने 10 बेटियों के जन्म के बाद 11वीं बार एक बेटे को जन्म दिया है, लेकिन इस 'खुशी' के पीछे जो दास्तां है, वह किसी की भी रूह कंपा देने के लिए काफी है.
5 ग्राम खून और मौत का जोखिम
जींद के ओजोस अस्पताल की डॉक्टर संतोष ने बताया कि जब महिला को इमरजेंसी में लाया गया, तो उसकी हालत काफी गंभीर थी. महिला के शरीर में केवल 5 ग्राम खून बचा था और गर्भ में पानी पूरी तरह खत्म हो चुका था.
10 डिलीवरी हो जाने से गर्भ फटने का खतरा था-डॉक्टर
10 डिलीवरी पहले ही हो चुकी होने के कारण गर्भाशय फटने (Uterine Rupture) और भारी रक्तस्राव का जबरदस्त खतरा था. डॉक्टर के अनुसार, यह उनकी लाइफ का पहला ऐसा केस था जहां कोई 11वीं डिलीवरी के लिए इस स्थिति में पहुंचा हो. हालांकि, तीन यूनिट खून चढ़ाने और गहन चिकित्सकीय निगरानी के बाद मां और बच्चे दोनों को सुरक्षित बचा लिया गया.
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क्यों हुई 10 बेटियां?
समाज और 'वंश' का दबाव इस कहानी का बैकग्राउंड और भी व्यथित करने वाला है. महिला के पति संजय, जो पेशे से एक दिहाड़ी मजदूर हैं, ने बताया कि उनकी शादी को 19 साल हो चुके हैं. बेटे की चाहत में एक के बाद एक 10 बेटियां पैदा हुईं. परिवार का कहना है कि उन्होंने कभी कन्या भ्रूण हत्या नहीं करवाई, लेकिन समाज और 'अपना वंश' बढ़ाने के दबाव ने उन्हें बार-बार जोखिम उठाने पर मजबूर किया.
हैरानी की बात यह है कि घर में पहले से ही बेटियों की फौज होने के बावजूद, हर बार बेटी होने पर परिवार में मातम जैसा माहौल हो जाता था. खुद बड़ी बेटी ने बताया कि "हर बार यही न्यूज मिलती थी कि बहन हुई है, तो बस रोना-धोना होता था".
हरियाणा के गांवों का कड़वा सच
हरियाणा में बेटियों के नाम अक्सर 'संतोष', 'अंतिम', 'भतेरी' या 'भरपाई' रखे जाते हैं, जिसका अर्थ ही यही होता है कि "अब बस, बहुत हुआ, अगला बेटा हो". यह घटना केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की ओर इशारा करती है जहां आज भी बेटियों को 'बोझ' और बेटों को 'हौसला' माना जाता है. मजदूरी करने वाले इस परिवार के पास अब 11 बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य की भारी चुनौती है.










